शनिवार, 20 जून 2009
जीवन और रिश्ते
जीवन और रिश्ते जीवन एक सुखद अनुभूति है जिसे हम न जाने क्यों आनंदित होकर जी नही पाते ,यह मानव का स्वभाव होता है कि जो उसके पास होता है वह उसे दिखाई नही देता ,और जो नही होता उसके पीछे भागता है जैसे अगर हमारा एक दांत टूट जाए तो जीभ बार बार उस जगह जाती है ,उस स्थान को टटोलती है --वैसे ही मानव का मन खाली जगह को टटोलता है ,भरी जगह के प्रति अंधा होता है ,अगर प्रभू की दी नेमतों को हम संजो कर रखे तो एक सार्थक व सुखी जीवन जी सकते हैं जीवन एक उत्सव है -उत्सव अकेले आनंद नही देते इसलिए हमें रिश्तों की जरुरत होती है रिश्ते कुछ तो जन्म के साथ ही जन्म लेते हैं पर कुछ रिश्ते हमें जीवन जीते हुए कदम कदम पर प्राप्त होते हैं रिश्ते बनाना आसन है पर ताउम्र निभाना मुश्किल होता है ,हमें अपने जीवन में रिश्ते निभाने में सुई धागा बनना चाहिए कैंची नही ,अगर अहंकार को त्यागकरने से थोड़ा झुकने से किसी रिश्ते को बचाया जा सकता है तो यह कीमत ज्यादा नही हैं ,कैची तो सदा चीजों को काटती है अलग करती है पर क्या ये उचित है रिश्ते कीअहमियत रिश्ते के टूटने के बाद महसूस होती है जब रिश्ता टूटे और पश्चाताप हो तो समझो कि रिश्ता गहरा था पर कभी जब रिश्ता टूटता है और हमें उस पर पश्चाताप नही होता तो समझों कि वह रिश्ता गहरा नही था ,वास्तव में हम उस उसे ढो रहे थे ,जीवन नैया को खेने के लिए रिश्तों की पतवार का होना जरूरी है इसलिए रिश्तों को सहेज कर रखना चाहिए
शुक्रवार, 12 जून 2009
कौसानी --एक प्राकृतिक संपदा
मेरी कौसानी यात्रा ---एक स्मृति_____________________
आज प्रकृति को जब इतने करीब से देखा तो मन मयूर नाच उठा ,कौसानी कहते ही सुमित्रानंदन पन्त की याद जेहन में आ जाती है वह कवि बने तो इसमें उनकी प्रकृति और उनके वातावरण का बहुत बड़ा हाथ रहा यह शैल
पताकाएं ,चारों तरफ़ प्राकृतिक उपादान ,अनंत गहराई तक फैले पेड़ और हरियाली ,दूर आकाश में उगता सूरज मानों अपनी तरफ़ खींच रहे हैं ,मन करता है कि यहीं बैठकर जीवन की सम्पूर्ण इच्छाए पूरण करूं बैजनाथ जी के मन्दिर जाते समय रास्ते का आच्छादित जंगल मन को मोह गया हालाकि रिसोर्ट होटल से मानव को सुविधा मिल जाती है पर इनके निर्माण से प्रकृति का विच्छेदन होता है हमारी प्राकृतिक सम्पदाएँ इसीलिये विलीन हो रही हैं क्योंकिहम भौतिक सुविधा के लिए सुकुमार प्रकृति का दोहन कर देते हैं आज बहुत दिनों बाद चिडियों की चाह चाहा हट सूनी ,यह कलरव सुने सदियाँ बीत गई ,-क्यों नहीं यह शब्द शहरों में सुनाई देते हैं ,क्योंकि हमारे शहर मोटर ,मशीन के शब्दों के आदी हो गए हैं ,हमें विचार करना होगा कि हमसे कहाँ चूक हो रही है ,कहीं एसा न हो कि हमसे देर हो जाए
चाय के बागान में उनके गुच्छों को देखकर मन प्रमुदित हो गया ,यह प्रकृति का हमें उपहार है कि एक ही स्थान पर हमें अनेक प्रकार का सौन्दर्य मिलता है ,हम प्रकृति का धन्यवाद तक नही करते हैं रे मानव -तू सावधान हो जा ,जो प्रकृति तेरा पोषण करती है तू उसका संचरण कर ,इसे संभाल कर रख इस पर अपने स्वार्थ की लाठी न चला
सदा अपनों ने ही अपनों को गिराया है ,
विभीषण ने ही लंका को धाया है
उतना नहीं खाया वन के जीवों ने
जितना आदमी ने जंगल को खाया है
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