अब श्राद्ध ,पितर पक्ष या महालय का समय प्रारंभ हो गया है यह १६ दिनों तक चलेगा श्राद्ध क्या है ?.......जब हम अपने पितरों के प्रति श्रद्धा पूर्वक अपने कर्तव्य का पालन करते हैं तो वह श्राद्ध कहलाता है अपने पितरों को प्रसन्न करना ,उन्हें तिलांजलि देना हमारा कर्तव्य है श्राद्ध करने का सीधा सम्बन्ध दिवंगत पारिवारिक जनों का श्रद्धा पूर्वक स्मरण करना है इसे पितृ यज्ञ भी कहा जाता है गरुड़ पुराण में कहा गया है कि पितर पक्ष में पितर अपने घर आते हैं और अपने स्वजनों से श्राद्ध की इच्छा रखते हैं हमारे पितर अन्न और जल से ही प्रसन्न हो जाते हैं कुश और तिल से तर्पण करने पर पितर संतुष्ट होते हैं
तिल और कुश का क्या महत्व है __ तिल की उत्पत्ती भगवान् विष्णु के शरीर से मानी गई है इसका दान अक्षय होता है कुश भगवान् वासुदेव के रोम छिद्रों से उत्पन्न होता है कुश में ब्रह्मा विष्णु और महेश का वास होता है
महिलाओं को कुश और तिल के साथ तर्पण करना मना है ,इसका सात्विक कारण है कि महिला मां का रूप होती है ,जो इस संसार में मनुष्य को उत्पन्न करती है ,जबकि तर्पण अवसान का प्रतीक है
श्राद्ध के दिन चावल से पिंड बनाकर काले तिलों से श्राद्ध कर्म करना चाहिए इस दिन ब्रह्मचर्य का पालन जरूरी है दान का विशेष महत्त्व है पितृ पक्ष में गाय ,कुत्ते और कोए को भोजन देने का प्रावधान है गाय के शरीर में सभी देवताओं का निवास माना गया है कुत्ता मानव को योनि मिलने तक साथ निभाता है ,एसा कहा गया है कोए को यम् का पक्षी बताया गया है ,यह म्रत्यु लोक और मानव लोक के बीच सेतु का काम करता है ,इसलिए इन्हें भोजन कराने से पिटर प्रसन्न होते हैं
आज आधुनिकता की दौड़ में लोग प्रश्न करते हैं कि मरकर कौन कहाँ गया हमें क्या पता ?सत्य क्या है कोई नही जानता पर मरने के बाद जीवात्मा जन्म लेती है यह सत्य है श्राद्ध करते समय हम प्रथ्वी पर अन्न बिखेरते हैं ,जल से तर्पण करते हैं तो जीवात्मा जिस रूप में प्रथ्वी में जन्म लेती है हमारे द्वारा दिया गया अन्न और जल उसको प्राप्त होता है चाहे वह वृक्ष योनि को प्राप्त हो ,पिशाच योनि को प्राप्त हो जलचर या कीटाणु आदि योनि को प्राप्त हो हमारे द्वारा दिया गया गंध दीपक देवत्व योनि को प्राप्त पितरों को जाता है वस्त्र ,आभूषण भोजन आदि मनुष्य योनि को प्राप्त पितरों को जाता है
श्राद्ध में सुपात्र ब्राह्मण अर्थार्त धरम का आचरण करने वाले ब्राह्मण को ही दान ,भोजन देना चाहिए वरना श्राद्ध का महत्व ख़त्म हो जाता है
वैदिक वांग्मय के अनुसार इस धरती पर जन्म लेते ही मनुष्य पर तीन ऋण चढ़ जाते हैं देव ऋण ,पितृ ऋण और रिशीऋण इन सोलह दिनों के श्राद्ध पक्ष में श्राद्ध करके हम पितृ ऋण से मुक्त हो सकते हैं कर्ण ने अपना सब कुछ दान दे दिया ,जीवन भर सत्कर्म किए परन्तु पितृ ऋण नही चुकाया इसलिए उसे मोक्ष नहीं मिला और उसे पितृ ऋण चुकाने के लिए उसे पुन प्रथ्वी
पर आना पड़ा अत: पितृ ऋण से मुक्त होना हमारा दायित्व है
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें